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सोमवार, 28 सितंबर 2009

जो बटन प्रोबलम कर रहया सै उसने डायरेकट कर दो -फौजी ताऊ मनफूल सिंग का कहणा

सुबह-सुबह ताऊ ने पता चल्या के ब्लोग्वानी बंद हो गयी ताऊ नई भी बड़ा अफ़सोस होया,के क्यूँ बंद होयगी? इसा के हो गया मेरी भी समझ में नहीं आया फेर दो चार लोंगो ने कहानी बताई सारी के सिर्फ एक बटन का ही प्रोब्लम सै, तो यारो जो बटन प्रोब्लम कर रह्या सै उसी ने हटा दो सारा रोला ख़तम,यो मान लो के बटन ही ख़राब हो गया था डायरेकट कर दो, हम भी कभी - कभी घर के बिजली के बटन,टयूबवेल के मोटर के बटन को डायरेकट करते है,यो सारा मामला रेंकिंग का सै पसंद -नापसंद का सै, हमने तो भाई इस ते इतना मतबल कोणी, भाई एक म्हारे जैसे गांव के गंवार की भी बाते पाठको तक पहुच रही सै यो ही म्हारे लिए बड़ी बात है, चाहे उसका माध्यम कोई भी हो, जैसे भी अपनी नाराजी दूर करो ब्लोग्वानी फेर से चालू करो,आज सुबह से ही ठीक नहीं लग रह्या सै, जणू अपना कोई ख़ास आज म्हारे ते बिछड़ गया, मन्ने तो यो समाचार भी अविनाश जी की पोस्ट ते मिल्या, तो लोगो एक बार फेर रिटायर फौजी हवलदार ताऊ मनफूल सिंग का कहणा सै के ब्लोगवाणी चालू करनी चाहिए.
रमलू भी यो ही बात कह रहया सै,

आपका 
रमलू लुहार  

बुधवार, 16 सितंबर 2009

मैडल वाला मुक्का जणू इसने ही मारया हैं-ताऊ फौजी मनफूल सिंग की चौपाल

ताऊ के घर के आगे नीम का पेड़ सै,आज साँझ नै अपनी चौपाल फेर जमने लग गई,लगभग सारे लिए पर ताऊ नही आया,सारे ताऊ का इंतजार कर रहे थे ,
रमलू बोल्या -"कल दोपहरे में ताऊ कह गया था के सारे बुड्ढों को बता देना के कल हिन्दी दिवस मान्या गया है सबको अपनी बोली में ही हिन्दी बोलना है,
रामेसर बोल्या-यो ताऊ हिन्दी दिवस कब मना गया हमने तो पता ही नही चाला,
बनवारी बोल्या-अपने हिंदुस्तान हिन्दी दिवस यूँ ही मनाया जाता है, के किसी को पता भी ना चाले और हिन्दी दिवस भी मन जा,
भाई क्यूँ हिन्दी के पीछे पड़ रहे हो, जब दिवस मन गया तो मन गया जब अपने ताऊ नै कै ही दिया सै तो मान भी लो और सारे हिन्दी बोलो,रामधन बोल्या
इतने में ताऊ भी आ गया
शिम्भू बोल्या-ताऊ राम-राम,
ताऊ बोल्या राम-राम,
भाई आज आपने देर हो गयी -रमलू बोल्या
अरे भाई आज म्हारे गाम में गुल्ली डंडा संग के अध्यक्ष का चुनाव था,
बड़ा हंगामा हुआ जैसे लाडू बाँट रहे हों,ताऊ बोल्या
रमलू बोल्या " तो ताऊ आपने भी परधानी का फार्म भरया था के ?
भरया तो था रे भाई, लेकिन हमने तो कुण जितने दे था. वहां तो बड़े बड़े आदमी आये थे लम्बी लम्भी गाड़ियों में बैठ के,
तो ताऊ अपना गुल्ली डंडा के सारे देश में इतन प्रसिद्ध हो गया जो इतने बड़े बड़े आदमी आये थे प्रधानी करने के लिए. रमलू बोल्या,
ताऊ बोल्या-अरे भाई पहले तो हुक्का भरो,अरे बनवारी चिलम सुलगा के नहीं लाया, सुसरे
आज ठाली बैठा हैं,
बनवारी बोल्या-नहीं ताऊ आपका इंतजाम तो मै आपके आने के पहले ही तैयार रखता हूँ, यो ले,
ताऊ नै एक सुट्टा मार के लम्बी सास भरी और बोल्या - अरे भाई यो परधानी इलेक्शन इतना बड़ा हो जायेगा मन्ने पता नहीं था, गाम में जैसे मेला लाग गया हो, सकुल के पास एक ने हलवाई बैठा दिया था,वो पूरी छोले मुफ्त में खिला रहा था,एक कंडीडेट ने जलेबी और दूध की ही दुकान लगा दी थी,अपने मुफ्त में खाए जाओ,
मन्ने हलवाई ते पूछ्या- छोरे तू ये बता तेरे को यहाँ ये मुफ्त की दुकान किसने लगवाई हैं?
हलवाई बोल्या - वो अपना सेठ हैं न बनिया रोडूमल उसने लगवाया हैं, वो भी खडा हैं न परधानी के लिए सबको मुफ्त में देशी घी की जलेभियाँ और इमरती खिला रहा सै,
अरे भाई इसकी बाम्बे में फैक्टरी भी सै ना-ताऊ बोल्या
हलवाई बोल्या - ताऊ इसकी मोबाइल की फेक्ट्री सै, सबने एक -एक मोबाइल भी देगा फ्री में,
तो भाई बता रमलू सारी जिन्दगी बचपने में गुल्ली डंडा हम खेले हमारे बाप दादा खेले और म्हारे बच्चे भी खेल रहे सै,ताऊ बोल्या
ताऊ तो अपने ज़माने में गुल्ली डंडे का एक लम्बर का खिलाडी था तुने तो परधान बनना जरूरी था?तू परधानी करता तो कम ते कम गुल्ली डंडा ओलम्पिक में शामिल तो हो जाता और गोल्ड मैडल अपने देश नै ही मिलता, रामेषर बोल्या,
ताऊ एक लम्बी साँस खीच के बोल्या, अरे भाई देख यो काम तेरे मेरे बस का नहीं हैं, आज जिसके पास पैसे हैं रुतबा हैं दिल्ली की गलियां जिसने जाने सै ये काम उसका हैं, सेन्ट्रल गोरमेंट नै खेल का अलग फंड बना रख्या सै, उसे सै ये खेल संघ नै पैसे देके चलावे सै, जब बिदेशां में कोई बड़ा टूर्नामेंट होसे तो ये हवाई जहाज से जा सै, अपनी लुगाई नै भी साथ ले जा सै चल घूम के आ जाना कहके,
रमलू बोल्या- तो यो बात सै ताऊ, तो अपने बच्चों को भी ले जाते होंगे?
ताऊ बोल्या- तू बच्चों की बात करता हैं ये मालिश करने वाले भी साथ में जाते हैं,नाम खिलाडियों का होता हैं और मालिश अपनी करवाते हैं, जब कोई खिलाडी अपनी मेहनत और काबिलियत ते जीत जाता हैं तो उसके साथ अपनी फोटो ऐसे खिचवाते हैं जैसे यो मैडल इसने ही लड़ के जित्या सै,
बनवारी बोल्या-हाँ मन्ने देख्या था जब अपना बिजेंद्र मैडल जिताया तो सारे फोटू खिचाने ऐसे कूदे के जणू मैडल वाला मुक्का इन्होने ही मारा हैं,
ताऊ बोल्या - के जमाना आ गया, जिसने कभी हाकी देखि नहीं वो हाकी संघ का प्रधान, जिसने कदे तीर धनुष नहीं देखा वो तीरंदाजी का प्रधान जैसे पुरे महाभारत की लडाई में गुरुद्रोन का परथम शिष्य वो ही था,जिसने कदे फुटबाल के एक भी लात नहीं मारी वो फूटबाल संघ का प्रधान,बना फिर रहा हैं,
बनवारी बोल्या- बताओ फेर देश को मैडल किस तरह मिलेगा? बड़े शर्म की बात सै सवा करोड़ की जनता में एक सोने मैडल लिया वो भी अपने दम पे लेके आया तो नाम रह गया नहीं तो नाक कटी की कटी पड़ी थी,
रमलू बोल्या-भाई यो सोचना देश की जनता का काम सै,आगे ऐसे आदमी चुन के भेजो जो जो म्हारे देश के खिलाडीयों के बारे में सोचे और खुद भी इन्टरनेशनल खिलाडी हो, उसका अनुभव ही हमें मैडल दिलाएगा,
ताऊ बोल्या-रमलू तुने सही बात कही ऐसा दिन हमको लाना ही पडेगा।नेताओं के लिए मेरी ये ही सलाह हैं की भाई तुम देश को चलाओ और खिलाडीयों को खेलने दो खेल संघ चलाने दो,चलो रे भाई दिया बत्ती का टैम हो गया सै,
रमलू बोल्या-ताऊ कल की पाकिस्तान की लडाई का किस्सा तो अधुरा ही रह गया,
ताऊ बोल्या-अरे मै अभी जिन्दा हूँ मरया कोणी फेर किसे दिन सुना देंगे,तुमने तो मन्ने इस लफडे में ही उलझा दिया ,चलो रे भाई सबने मेरी राम-राम

आपका

रमलू लुहार

मंगलवार, 15 सितंबर 2009

हिंदी नहीं आती तो भैंस ही चराते :- रिटायर फौजी हवलदार ताऊ मनफूल सिंग कहणा

आज ताऊ दोपहरे में ही आ गया बोल्या रमलू के कर रहया सै ,
मैं बोल्या ताऊ अखबार पढूं सुं,
ताऊ बोल्या के समाचार लिख रखया सै ,
मैं बोल्या ताऊ कल हिन्दी दिवस मनाया गया सै ,उसे का समाचार सै,
ताऊ बोल्या -कोई नई बात?
मैं बोल्या -ताऊ नई बात सै के हिन्दी का परचार और प्रसार होना चाहिए हिन्दी राष्ट्रा भाषा तो बनगी पुरे राष्ट्र की भाषा नहीं बनी से
ताऊ बोल्या -क्यूँ ?
मैं बोल्या - साल में एक बार हल्ला मचावे हैं।हिंदी दिवस मनाया गया अख़बार में आपनी अपनी फोटो छाप ले हैं.हिंदी जिंदाबाद कर ले हैं, हो गया हिंदी दिवस,हिंदी नै सब जगह लागु करने के लिए राजनैतिक इच्छा शक्ति जरुरी हैं.सरकार ने हर जगह बोर्ड लगा रखे हैं, हिंदी लिखो, हिंदी आवेदन करो,हिंदी भाषा का ज्यादा से ज्यादा उपयोग करो, पण मेरे को कही नहीं लगता के हिंदी सरकारी भाषा भी बनी हैं, सरकार की कथनी करनी में खुद ही फर्क हैं, ये सोच अंग्रेजों ने कम्पूटर भी हिंदी में बना दिया,चलो रे भाई तुम हिंदी वाले भी चलाओ, मेरे को अंग्रेजी बिलकुल ही नहीं आती, फेर भी मैं कम्पूटर चला लेता हूँ.
ताऊ बोल्या-भाई रमलू हिंदी बिना तो काम ही नहीं चलता, अंग्रेजों को भी हिंदुस्तान पे राज करने के लिए हिंदी सीखनी पड़ी थी,नहीं तो के वो राज कर सकते थे, जब उनसे अपना राज वापस लेना था तो हमारे नेताओं को अंग्रेजी सीखनी पड़ी,अंग्रेज तो चले गए राज छोड़ के पण यो अंग्रेजी इनके मत्थे लगा गये, सारे जितने बड़े काम हो सै ना सब अंग्रेज्जी मै हो सै. फेर हिंदी के साथ दोगली निति लगा रखी सै, जिसने अंग्रेजी पढ़ ली वो अफसर ,जिसने हिंदी पढ़ी वो चपरासी, बात ये भी राज की सै ,अगर चपरासी भी अंग्रेजी पढ़ा लिखा लगावेंगे तो साहब अफसरों की काली करतुते पढ़ नहीं लेगा, जाण नहीं जायेगा
मैं बोल्या -ताऊ आपने तो ये बड़े पते की बात कही, चाहे मंत्रालय का काम हो, कोर्ट कचहरी का सारा ही अंग्रेजी में हो से। एक बात और बताऊँ आपने, या लाइफ इंश्योरेंस कम्पनी जीवन बीमा सरकारी सै ,पर इसके अग्रीमेंट में लिख रखा सै के "विवाद की स्थिति में अंग्रेजी में लिखा हुआ अग्रेमेंट माना जायेगा.
ताऊ बोल्या-ये जीवन बीमा कम्पनी के अंग्रेज फूफे लगा करते थे।'सुसरे पैसे म्हारे और गुण अन्ग्रेज्जो के. के सरकार को नहीं दीखता के यो के करतूत करने लग रहे हैं.
मैं बोल्या-ताऊ आज ते नब्बे साल पहले अंग्रेजी राज में भरतपुर के महाराजा किशन सिंग जी ने अपने स्टेट में हिंदी लागु कर दी थी ,और डुंडी पीटवा दी थी के उनके राज में सरकारी काम सिर्फ हिंदी में ही होगा उसने १९१८ में राज सँभालते ही ये काम किया।राजनैतिक इच्छा शक्ति होना चाहिए बस,
ताऊ बोल्या-म्हारा हरियाणा,राजस्थान,उ।प,बिहार,छात्तिसगड़,हिमाचल,उत्तराखंड,एम्.पी.सारे ही हिंदी भासी परदेश हैं,यहाँ के आदमी को बिना हिंदी के काम ही नहीं चलता,थोडा घणा उच्चारण का ही फर्क हैं, भाई इतने साल हमने फौज नोकरी हिंदी में ही तो करी हैं.नहीं आज भी भैंस ही चराते रहते. भाई हिंदी म्हारी प्राण वायु हैं इसके बिना तो जीने की हम सोच ही नही सकते. आज से अपनी मण्डली वाले सारे बूढों को बोल देना की थोडी बहुत गलती चलेगी फेर हिंदी बोलने की कोशिश पूरी करें.आज म्हारा भी हिंदी दिवस हो गया. बाकी बाद में देखेंगे.

आपका
रमलू लुहार

रविवार, 13 सितंबर 2009

आज ताऊ की आंट कोण आया देखो?????????

ताऊ आज तावला-तावला बस अड्डे से आण लग रह्या था में भी कुछ पड़चुनी का सामन लें जा रह्या था."ताऊ राम-राम कहाँ भाज्या जा रह्या सै तावला-तावला?"
ताऊ बोल्या "अरे जा नही रहा रह्या हूँ."ससुरा गया था. तेरी ताई नै घी जोड़ राख्या था.उसके भतीजे का ब्याह सै दीवाली पीछे.कई दिन ते कह रही थी ,सोच्या के आज उसकी भी शिकायत दूर कर दयूं
मै बोल्या ताऊ जल्दी जा तेरी मण्डली पोली के आगे तैयार बैठी सै.हुक्का राख्या सै, और रामधन चिलम सिल्गान गया था ,जाते ही गरम -गरम मिलेगीसामान लेके मैं भी पहुँच रह्या सूं।

ताऊ गया अपने ठिकाने पे, मण्डली जमी हुई थीहुक्का तैयार था ,गाम के सारे बिगडे हुए ,घर से काढे हुए बुड्ढे मौजूद थे, ताऊ का ही इंतजार हो रह्या था, ताऊ तो म्हारे गाम की रौनक सै,
ताऊ के पहुचते ही सारे बोले "ताऊ राम-राम.कित हो आया?
ताऊ बोल्या ससुराल गया था ,घी पहुचाने,तम बताओ के चल रहया सै,
बनवारी बोल्या हम तो ताऊ तेरी ही बाट देखे थे ,कल का किस्सा फोज आला आगे भी सुनना सै,
वाह रे भाई !!! आगे की सुण ल्यो,
लडाई का टाइम था म्हारी कानबाई (गाड़ियों का काफिला) जम्मू ते श्रीनगर जावे था ,रस्ते में ब्रेक हुआ हम सब खाना खाने बैठे ,खाना खाने के बाद चलन लगे तो,म्हारी गाडी स्टार्ट ही नहीं हुई,पुराना ज़माना था ,गाडियाँ भी इसी थी के ठण्ड के मारे डीजल भी जम जाया करता.
हमारे सूबेदार साहब बोले "हवलदार मनफूल सिंग ! गाडी स्टार्ट क्यों नहीं हो रही हैं?
पता नहीं साब के बिगड़ गया? जोंगा जीप थी,
चलो बोनट खोलो हम देखते हैं.
मेने बोनट खोल्या ,सूबेदार ने मरमम्त का काम चालू कराया.पंप का आइल काला था वो साब के सारे कपडों में लग गया.खैर गाडी तो चालू होयगी.साब बोले मेरी दूसरी वर्दी लाओ, और इसको साफ़ करवा देना , जी साब .
वो वर्दी मेने डांगरी को दे दी.उसने मेरे ते पूछ्या साब "इसमें तो काला आइल ज्यादा लग साबुन से तो साफ़ होगी नहीं(उस ज़माने में कोण सा सुपररीन ,सर्फ़ एक्सेल मिल्या करता), वो डांगरी भी सुसरा बावली बूच था .सुसरा आधा पागल .
मेने उसते क्या "म्हारे पास पेट्रोल घणा ही तो एक काम कर इसे पेट्रोल से साफ़ कर ले."
वो गया और शेर के बच्चे ने पेट्रोल का जरीकेन निकाल के उसमे सारी वर्दी हैट सब डबो के धो दिए ,
उसमे से बाद में पेट्रोल नहीं निकला तो ,मेरे धोरे आया
और बोल्या साब "वर्दी तो धो दी पण उसका पेट्रोल नहीं निकल रहा हैं.
मन्ने सोच्या मन ही मन के इब साला आंट में आया सै १५ अगस्त आले दिन साले ने मेरी वर्दी ऐसी धोई थी के सी.ओ.साब नै परेड ग्राउंड मै ही सबके सामने मेरी परेड ले ली.आज इसका भी नंबर सै ,
मै बोल्या "अरे छीतरिया तू रह गया न मुर्ख का मुर्ख". एक काम कर,माचिस सै तेरे धोरे?
वो बोल्या -हाँ साब
मै बोल्या -तू नु कर उस पत्थर पे इस वर्दी नै धर के आग लगा दे ,पेट्रोल -पेट्रोल जल जा गा. और वर्दी मेसे पेट्रोल भी निकल जा गा ,सूबेदार साब भी तन्ने शाबासी देगा.
आगे के होया आप खुद समझदार हो,वो भी सुण ल्यो
सूबेदार साब नै उसको साबासी दी और इनाम में एक हफ्ते २ घंटे की पिट्टू परेड कराई ,इसके बाद एक हफ्ते के क्वाटरगार्ड ड्यूटी भी लगाई ,तो भाई फौज के तो ये मजे थे ,पहले के आदमी भोले भी थे.बात मान भी जाया करते.
चालो भाई दिया बत्ती का टाइम हो रह्या सै, थारी ताई भी बाट देखती होगी के मेरे पीहर गया था के सामाचार लाया, बाकी कल देखेंगे, अरे भाई काल तो मन्ने भिवानी जाना सै.सांझ नै मिलेंगे.अरे बनवारी यो हुक्के की के तम्बाखू लाया सै, कल थोडी झटके वाली लाइए ,यो ओडर देके ताऊ हुक्के का एक दम मार के घर नै चाल पड़ा .
भाई आपने यो म्हारा फौजी ताऊ कैसा लाग्या,एक चटका लगा के अपनी उपस्थिति दर्ज कराओ
और भाई एक बात बताऊँ "यो उड़न तस्तरी आराम कब करे सै इसका पता लगे तो मन्ने जरुर बतइयो,मन्ने तो लगे सै इसने कई डरैवर राख रक्खे सै जब ही रात-दिन हांडती फिरे सै,क्यूँ के ताऊ धोरे भी आवेसै रात नै."

आपका
रमलू लुहार


(फोटो गूगल से साभार )

 

फ़ौजी ताऊ की फ़ौज